Safari Google Chrome tracking: Apple कर रहा है Safari में Google की प्रोमोशनल एक्टिविटी को ट्रैक करने वाले कोड का टेस्ट

Apple की नई टेस्टिंग: Safari में Google Chrome प्रोमोशन्स की ट्रैकिंग

टेक जगत में ब्राउज़र कॉम्पिटिशन और रेगुलेटरी स्क्रूटनी के बीच एक नया मोड़ देखने को मिल रहा है। Apple अपने वेब ब्राउज़र Safari के जरिए Google की इन-ब्राउज़र प्रोमोशनल गतिविधियों पर पैनी नज़र रखने की तैयारी कर रहा है। हालिया रिपोर्ट्स और टेक्निकल एनालिसिस के मुताबिक, Apple अपने ऑपरेटिंग सिस्टम के आगामी अपडेट्स में Safari Google Chrome tracking कोड की टेस्टिंग कर रहा है। इस फीचर के माध्यम से Apple यह पता लगा रहा है कि जब यूज़र्स Safari में Google के होमपेज या सर्च रिजल्ट पेजों पर विजिट करते हैं, तो Google कब और किस तरह अपने अन्य प्रोडक्ट्स, जैसे Chrome ब्राउज़र और Google app, को प्रमोट करने वाले बैनर दिखाता है।

यह डेवलपमेंट विशेष रूप से iOS 27.2 beta 2 के बाद से देखा गया है। Tech रिपोर्ट्स और रिसर्च के अनुसार, Apple Safari के भीतर ऐसे मैकेनिज्म को एम्बेड कर रहा है जो न केवल प्रमोशनल एलिमेंट्स की पहचान करता है, बल्कि यूज़र द्वारा उन प्रोमोशन्स के साथ किए गए इंटरैक्शन को भी लॉग करता है। इस कदम को टेक इंडस्ट्री में एक बड़े रणनीतिक और रेगुलेटरी डेवलपमेंट के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि Apple और Google के बीच का सर्च एग्रीमेंट और मोबाइल ब्राउज़र मार्केट में उनका मुकाबला लंबे समय से वैश्विक नियामकों के निशाने पर रहा है।

टेक्निकल मैकेनिज्म: स्क्रिप्ट इंजेक्शन और ट्रैकिंग का तरीका

Safari का यह नया ट्रैकिंग मैकेनिज्म बैकएंड में काफी गहराई से काम करता है। रिसर्च डेटा के अनुसार, Safari का यह फीचर Google के वेब पेजों पर एक विशेष जावास्क्रिप्ट (.js script) को इन्जेक्ट करके काम करता है। यह .js script मुख्य रूप से Google के मुख्य होमपेज और सर्च रिजल्ट्स पेजों (SERP) को स्कैन करने का काम करती है।

जब कोई यूज़र Safari में Google पर कुछ सर्च करता है, तो इन्जेक्ट की गई यह स्क्रिप्ट पेजों पर विजिबल प्रमोशनल बैनर या अन्य विजुअल एलिमेंट्स की तलाश करती है। इस प्रक्रिया में निम्नलिखित टेक्निकल स्टेप्स शामिल हैं:

  • कस्टम URL स्कीम्स की पहचान: यह इन्जेक्टेड कोड पेजों के अंदर छिपे उन कस्टम URL स्कीम्स को डिटेक्ट करता है जो Chrome या Google app को ट्रिगर करने या ओपन करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
  • App Store IDs की ट्रैकिंग: यह स्क्रिप्ट उन स्पेसिफिक iOS App Store IDs को स्कैन करती है जो Chrome ब्राउज़र और Google app से जुड़े होते हैं। इससे Safari को तुरंत पता चल जाता है कि स्क्रीन पर दिखाई दे रहा प्रोमोशनल बैनर Google के किस ऐप को डाउनलोड या ओपन करने के लिए कहा जा रहा है।
  • टेलीमेट्री और इवेंट लॉगिंग: एक बार प्रमोशनल बैनर डिटेक्ट होने के बाद, सिस्टम बैकएंड में इवेंट्स को लॉग करना शुरू कर देता है।

लॉग होने वाला डेटा और यूज़र इंटरैक्शन

Safari का यह नया कोड केवल बैनर की उपस्थिति दर्ज करके शांत नहीं रहता, बल्कि यह यूज़र बिहेवियर और स्टेटस से जुड़ा महत्वपूर्ण डेटा भी इकट्ठा करता है। रिसर्च के मुताबिक, यह फीचर कई प्रमुख इवेंट्स और पैरामीटर्स को लॉग करता है:

सबसे पहले, यह सिस्टम यह रिकॉर्ड करता है कि Google सर्च पेज पर प्रोमोशनल बैनर यूज़र को दिखाया गया था या नहीं (Banner display status)। इसके बाद, यह कोड यह भी जांचता है कि क्या यूज़र उस समय अपने Google अकाउंट में साइन-इन (signed in) है या नहीं। यह जानकारी Google द्वारा यूज़र्स को टारगेट किए जाने वाले विज्ञापनों और प्रोमोशन्स के पैटर्न को समझने में मदद करती है।

तीसरा और सबसे अहम पहलू है यूज़र का रिस्पॉन्स। Safari यह लॉग करता है कि यूज़र ने Google के उस बैनर इंटरैक्शन को स्वीकार (accept) किया है या उसे खारिज (dismiss) कर दिया है। यानी अगर यूज़र ने Chrome डाउनलोड करने या Google app में स्विच करने के प्रोमो पर क्लिक किया, तो उसे भी रिकॉर्ड किया जाएगा, और अगर यूज़र ने ‘Cross’ या ‘Not Now’ करके बैनर बंद कर दिया, तो उस रिजेक्शन को भी टेलीमेट्री डेटा में लॉग किया जाएगा।

रिसर्च के संदर्भ में, यूज़र कम्युनिटी और फोरम्स में Google के इस तरह के अचानक आने वाले प्रॉम्पट्स को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। उदाहरण के लिए, कम्युनिटी चर्चाओं में यूज़र्स ने “SIGN IN WITH GOOGLE pop up bottom window would have an ON/OFF toggle in Safari settings to block it.” जैसे विचारों पर चर्चा की है, जबकि कुछ यूज़र्स ने बार-बार आने वाले इनवेसिव बैनर्स को “cheap and crappy” करार दिया है। हालांकि, Apple का यह नया कोड ब्लॉक करने के बजाय वर्तमान में केवल डेटा लॉगिंग और ट्रैकिंग पर केंद्रित दिखता है।

iOS 27.2 बीटा वर्जन और आधिकारिक डॉक्यूमेंटेशन की स्थिति

Apple द्वारा इस Safari Google Chrome tracking फीचर की टेस्टिंग iOS 27.2 beta 2 से शुरू की गई थी। इसके बाद iOS 27.2 beta 3 और Safari 27.2 beta रिलीज़ नोट्स सामने आए हैं। हालांकि, ध्यान देने योग्य बात यह है कि Apple ने इस पूरे फीचर को पूरी तरह से बैकएंड में रखा है।

iOS 27.2 beta 3 और Safari 27.2 beta के आधिकारिक रिलीज़ नोट्स में Apple ने इस टेलीमेट्री या ट्रैकिंग फीचर का कोई सार्वजनिक रूप से जिक्र (public documentation) नहीं किया है। टेक पब्लिकेशन्स जैसे 9to5Mac और उनके रिपोर्टर्स जैसे Marcus Mendes, Chance Miller, Ryan Christoffel, और KindredMAC जैसे एनालिस्ट्स ने सिस्टम कोड का विश्लेषण करके इस बदलाव को उजागर किया है। जॉन टर्नस (John Ternus) और Apple के अन्य एग्जीक्यूटिव्स की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

अक्टूबर 5, 2026 (Oct 5 2026), अक्टूबर 15, 2026 (Oct 15 2026) और अक्टूबर 16, 2026 (Oct 16 2026) की समयावधि के दौरान सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, यह बात अभी अस्पष्ट है कि क्या यह फीचर iOS 27.2 के फाइनल पब्लिक रिलीज़ के समय सभी यूज़र्स के लिए शिप किया जाएगा या नहीं।

रेगुलेटरी बैकड्रॉप: UK और यूरोपीय संघ की जांच

इस पूरे डेवलपमेंट को समझने के लिए वैश्विक स्तर पर बिग टेक कंपनियों पर चल रही रेगुलेटरी जांच को देखना बेहद जरूरी है। यूके (UK) और यूरोपियन यूनियन (EU) दोनों ही क्षेत्रों में Apple और Google के व्यावसायिक रिश्तों की गहन समीक्षा की जा रही है।

यूके एंटी-ट्रस्ट रेगुलेटर्स की समीक्षा

यूनाइटेड किंगडम में रेगुलेटर्स इस बात की जांच कर रहे हैं कि Apple और Google के बीच जो मल्टी-बिलियन डॉलर सर्च एग्रीमेंट है (जिसके तहत Google, Safari पर डिफॉल्ट सर्च इंजन बना रहता है), क्या वह मोबाइल ब्राउज़र मार्केट में दोनों कंपनियों के बीच कॉम्पिटिशन के इंसेंटिव्स को कम करता है। यूके रेगुलेटर्स यह जानना चाहते हैं कि क्या डिफॉल्ट डील की वजह से Safari और Chrome के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रुक रही है।

इसके जवाब में, Google ने यूके रेगुलेटर्स के सामने यह तर्क दिया है कि वह iPhone यूज़र्स को अपने फीचर्स और ऐप्स के प्रति आकर्षित करने के लिए लगातार प्रयास करता है। Google ने यूके में iPhone यूज़र्स के सामने Chrome को प्रमोट करने के अपने अभियानों का हवाला देते हुए यह दावा किया है कि वह वास्तव में Safari के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है और यूज़र्स को अल्टरनेटिव ब्राउज़र का विकल्प दे रहा है। Apple द्वारा Safari में Google के इन्हीं इन-ब्राउज़र प्रोमोशन्स को ट्रैक करना सीधे तौर पर रेगुलेटरी बहसों से जुड़ा हो सकता है।

यूरोपीय संघ का डिजिटल मार्केट्स एक्ट (DMA)

यूरोपीय संघ (EU) में डिजिटल मार्केट्स एक्ट (DMA) लागू होने के बाद से स्थिति और भी सख्त हो चुकी है। DMA के तहत Apple जैसे ‘गेटकीपर्स’ के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे यूज़र्स को ब्राउज़र विकल्प चुनने का निष्पक्ष अवसर (browser choice screen) दें। यूरोपीय आयोग (European Commission) ने पहले Apple के Safari चॉइस स्क्रीन अनुपालन (choice screen compliance) की जांच की थी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यूज़र्स को किसी तीसरे पक्ष के ब्राउज़र जैसे Chrome या Firefox को चुनने में कोई बाधा न आए।

बिजनेस और स्ट्रेटेजिक मायने: Apple ऐसा क्यों कर रहा है?

Apple द्वारा Safari Google Chrome tracking फीचर का परीक्षण करने के पीछे दो मुख्य संभावनाएं और अनिश्चितताएं (uncertainties) सामने आती हैं:

  1. रेगुलेटरी साक्ष्य जुटाना (Regulatory Evidence): यह संभव है कि Apple यह डेटा इसलिए इकट्ठा कर रहा हो ताकि वह UK में CMA या EU में यूरोपियन कमीशन जैसे नियामकों को दिखा सके कि Google किस हद तक Safari के भीतर अपने ऐप्स का आक्रामक प्रचार करता है। यदि नियामकों का आरोप है कि Safari और Chrome में कॉम्पिटिशन की कमी है, तो Apple इस टेलीमेट्री डेटा का उपयोग यह साबित करने के लिए कर सकता है कि Google सर्च पेज के माध्यम से लगातार लाखों यूज़र्स को Safari छोड़कर Chrome पर जाने का न्योता देता है।
  2. यूज़र एक्सपीरियंस और एंटी-प्रोमप्शन्स: दूसरी संभावना यह है कि Apple इस डेटा का विश्लेषण अपने यूज़र्स के ब्राउज़िंग एक्सपीरियंस को बेहतर बनाने के लिए कर रहा हो। यदि Google के प्रोमोशनल बैनर यूज़र एक्सपीरियंस को प्रभावित कर रहे हैं या यूज़र्स उन्हें लगातार खारिज (dismiss) कर रहे हैं, तो Apple भविष्य में इन इनवेसिव प्रोमोशन्स या पॉप-अप्स को ब्लॉक करने के लिए Safari में कोई टॉगल या प्राइवेसी फीचर ला सकता है।

सकारात्मक पहलू और संभावित लाभ (Key Benefits)

यदि यह टेलीमेट्री फीचर आधिकारिक तौर पर रोलआउट होता है, तो इसके कई फायदे हो सकते हैं:

  • पारदर्शिता (Transparency): यूज़र्स को इस बात का स्पष्ट डेटा और सुरक्षा मिलेगी कि वेब पेजों पर उनके व्यवहार को टेक दिग्गज किस तरह ट्रैक और प्रोमोट करते हैं।
  • रेगुलेटरी स्पष्टता: नियामकों के पास निष्पक्ष आंकड़े होंगे कि मोबाइल प्लेटफॉर्म्स पर वास्तविक प्रतिस्पर्धा कैसी दिखती है।
  • यूज़र कंट्रोल: यदि Apple इस डेटा के आधार पर Safari में प्रोमोशनल ब्लॉकर्स या फ़िल्टर्स देता है, तो यूज़र्स को सर्च करते समय अनचाहे ऐप-स्विचिंग प्रॉम्प्ट्स से मुक्ति मिल सकती है।

जोखिम, सीमाएं और अनिश्चितताएं (Risks and Limitations)

इस फीचर के साथ कुछ सीमाएं और अनिश्चितताएं भी जुड़ी हुई हैं:

  • अनकन्फर्म्ड शिपिंग: यह अभी भी एक बीटा फीचर (iOS 27.2 beta 2 / beta 3) है। Apple ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह फीचर अंतिम सॉफ़्टवेयर रिलीज़ का हिस्सा बनेगा या केवल आंतरिक परीक्षण तक सीमित रहेगा।
  • प्राइवेसी से जुड़ी चिंताएं: हालांकि Apple अपने यूज़र्स की प्राइवेसी का दावा करता है, लेकिन पेजों में .js script इन्जेक्ट करके यूज़र के साइन-इन स्टेटस और क्लिक्स को लॉग करने का तरीका खुद डेवलपर्स और प्राइवेसी जानकारों के बीच सवाल खड़े कर सकता है।
  • कंपनियों के बीच तनाव: इस प्रकार की ट्रैकिंग से Apple और Google के बीच कानूनी और व्यावसायिक तनाव और बढ़ सकता है, खासकर तब जब दोनों कंपनियां अरबों डॉलर के सर्च राजस्व समझौते से बंधी हुई हैं।

आगे क्या देखें (What to Watch Next)

तकनीकी और व्यावसायिक दृष्टि से आने वाले दिनों में निम्नलिखित घटनाक्रमों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा:

1. क्या Apple iOS 27.2 के अगले बीटा या फाइनल पब्लिक बिल्ड में इस टेलीमेट्री फीचर के बारे में किसी सार्वजनिक दस्तावेज़ या रिलीज़ नोट में जानकारी देता है।
2. यूके और ईयू के रेगुलेटर्स द्वारा चल रही जांच में इस डेटा या प्रतिस्पर्धी दावों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है।
3. क्या Google अपने सर्च पेजों पर यूआरएल स्कीम्स या बैनर डिस्प्ले कोड में कोई बदलाव करता है ताकि इस प्रकार की इन-ब्राउज़र ट्रैकिंग से बचा जा सके।