स्टारबक्स पर भ्रामक मार्केटिंग और शुगर-फ्री ड्रिंक्स को लेकर मुकदमा दर्ज

भारतीय और वैश्विक बिजनेस मार्केट में कई बार ऐसी खबरें सामने आती हैं जो कंज्यूमर अधिकारों और मार्केटिंग के तरीकों पर बड़े सवाल खड़े करती हैं। हाल ही में एक ऐसा ही मामला सामने आया है जहां दुनिया की दिग्गज कॉफी हाउस कंपनी स्टारबक्स को एक बड़े कंज्यूमर मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने फूड और बेवरेज सेक्टर में पारदर्शिता और लेबलिंग के मुद्दों को फिर से चर्चा में ला दिया है। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

क्या बदला है और विवाद की शुरुआत कैसे हुई

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब अमेरिका में स्टारबक्स के खिलाफ एक फेडरल कंज्यूमर मुकदमा दर्ज किया गया। यह मुकदमा तीन कंज्यूमर्स की ओर से दायर किया गया है। मुकदमे का मुख्य आरोप यह है कि कंपनी अपनी प्रोटीन ड्रिंक्स को ‘शुगर-फ्री’ या बिना चीनी के तौर पर प्रमोट करती है, जबकि असलियत में उन ड्रिंक्स में शुगर मौजूद होती है।

एसोसिएटेड प्रेस (Associated Press) की रिपोर्ट के मुताबिक, यह शिकायत स्टारबक्स की मार्केटिंग और उसके प्रोडक्ट्स की नेमिंग पर सवाल उठाती है। मुकदमे में यह कहा गया है कि कंपनी का यह तरीका झूठा, भ्रामक और गैरकानूनी है।

बेवरेज की मेनू लिस्टिंग और मार्केटिंग का तरीका

विवादित ड्रिंक्स को लेकर यह जानकारी सामने आई है कि वे स्टारबक्स की अमेरिकी वेबसाइट पर ‘No Added Sugar Options’ (बिना चीनी जोड़े गए विकल्प) नामक हेडर के तहत लिस्टेड हैं। इसके अलावा, प्रत्येक पेय पदार्थ के व्यक्तिगत आइटम के नाम में ‘Sugar-Free’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है।

हालांकि, जब कोई यूजर वेबसाइट पर किसी ड्रिंक को चुनता है, तो एक कस्टमाइजेशन पेज सामने आता है जिसमें न्यूट्रिशन से जुड़ी जानकारी दी जाती है और उसमें शुगर की मात्रा भी लिखी होती है। लेकिन मुकदमे के अनुसार, शुरुआती नाम और हेडर कंज्यूमर्स को भ्रमित करने वाले हैं।

मुख्य लाभ, दावे और तुलना

इस मुकदमे में सबसे चौंकाने वाला दावा यह किया गया है कि इन ‘शुगर-फ्री’ कही जाने वाली ड्रिंक्स में एक स्टैंडर्ड चॉकलेट प्रोडक्ट से भी ज्यादा शुगर हो सकती है।

शोध और डेटा के अनुसार:

  • वेबसाइट के मुताबिक, 16-औंस (16-ounce) वाली ‘Sugar-Free Caramel Protein Matcha’ और ‘Sugar-Free Caramel Protein Latte’ दोनों में 16 ग्राम शुगर होती है।
  • अगर ग्राहक वेंटि (Venti) साइज का विकल्प चुनते हैं, तो यह शुगर की मात्रा बढ़कर क्रमशः 21 ग्राम और 20 ग्राम तक पहुँच जाती है।
  • तुलना के लिए, एक स्टैंडर्ड 1.5-औंस के टू-पैक वाले ‘Reese’s Peanut Butter Cup’ में 11 ग्राम शुगर होती है।

हेगेंस बर्मन (Hagens Berman) के स्टीव बर्मन (Steve Berman) ने कहा कि कंज्यूमर कई कारणों से शुगर से बचते हैं, जैसे कि सामान्य स्वास्थ्य, डायबिटीज, ब्लड ग्लूकोज लेवल या अन्य कारक। ऐसे में इस तरह की भ्रामक लेबलिंग कंज्यूमर्स के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है।

बिजनेस और सेक्टर पर क्या होगा असर

जब इस तरह के मामले सामने आते हैं, तो इसका सीधा असर फूड और बेवरेज कंपनियों की साख पर पड़ता है। हालांकि, तकनीकी और बिजनेस रणनीतियों के लिहाज से कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स की सामग्री को लेकर पारदर्शिता बनाए रखने का दावा करती हैं। इस मामले में भी इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि लेबलिंग और मार्केटिंग के नियमों को और सख्त किया जा सकता है, जिससे कंज्यूमर्स को किसी भी प्रकार का भ्रम न हो।

जोखिम या सीमाएं और स्टारबक्स का पक्ष

इस कानूनी विवाद में जहाँ एक ओर कंज्यूमर्स की तरफ से गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वहीं दूसरी ओर स्टारबक्स ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

स्टारबक्स ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया है कि इन ड्रिंक्स में मौजूद शुगर उस प्रोटीन-युक्त दूध से आती है जिसका इस्तेमाल इन्हें बनाने में किया जाता है। कंपनी का कहना है कि उसने अलग से कोई चीनी नहीं मिलाई है और पेय पदार्थों में इस्तेमाल होने वाला फ्लेवरिंग सिरप वास्तव में शुगर-फ्री है।

एक स्टारबक्स प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी का मानना है कि इन दावों का कोई आधार नहीं है और वह इस मामले में खुद का पुरजोर बचाव करेगी। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि स्टारबक्स ने हमेशा से अपने प्रोडक्ट अनाउंसमेंट, मेनू, मार्केटिंग मटेरियल, वेबसाइट और ऐप पर अपनी प्रोटीन ड्रिंक्स, शुगर-फ्री विकल्पों, कस्टमाइजेशन विकल्पों और न्यूट्रिशनल कंटेंट के बारे में लगातार और स्पष्ट रूप से जानकारी दी है।

कौन हो सकता है प्रभावित

इस मुकदमे का असर मुख्य रूप से उन कंज्यूमर्स पर पड़ता है जो स्वास्थ्य कारणों, डायबिटीज या फिटनेस गोल्स के चलते जानबूझकर शुगर का सेवन नहीं करना चाहते। जब वे किसी प्रोडक्ट पर ‘Sugar-Free’ देखते हैं, तो वे उसे सुरक्षित मानकर खरीदते हैं। यदि ऐसे प्रोडक्ट्स में भी शुगर पाई जाती है, तो यह कंज्यूमर ट्रस्ट के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। इसके अलावा, अमेरिका में फूड और बेवरेज सेक्टर की अन्य कंपनियां भी अपनी मार्केटिंग और लेबलिंग की नीतियों की समीक्षा करने पर मजबूर हो सकती हैं।

आगे क्या देखना बाकी है

यह मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है। मुकदमे की मांग है कि जिन ग्राहकों ने यह मानकर ड्रिंक्स खरीदी थीं कि वे शुगर-फ्री हैं, उन्हें हर्जाना दिया जाए और स्टारबक्स को इन ड्रिंक्स को ‘शुगर-फ्री’ के रूप में मार्केट करने से रोका जाए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि फेडरल कोर्ट इस मामले में क्या फैसला सुनाता है और क्या स्टारबक्स अपनी मार्केटिंग रणनीति में कोई बदलाव करता है या नहीं।