वायुमंडल के साथ उड़ान: पहली एयर‑श्वास सैटेलाइट थ्रस्टर का परीक्षण

विकासशील अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में एक नई दिशा खुलने वाली है। अब तक के सभी प्रोपल्शन सिस्टम के विपरीत, एक नया एयर‑श्वास थ्रस्टर वायुमंडल के ऑक्सीजन का इस्तेमाल करके सैटेलाइट को आगे बढ़ाने का दावा करता है। यह पहली बार है जब किसी सैटेलाइट को वायुमंडल का सहारा लेकर उड़ाने का प्रयोग किया जाएगा। air-breathing satellite thruster से जुड़ी यह जानकारी इस विषय को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

air-breathing satellite thruster: क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

वेरली लो अर्थ ऑर्बिट (VLEO) की चुनौतियाँ

वेरली लो अर्थ ऑर्बिट, यानी 200 से 400 किलोमीटर के बीच का अंतरिक्ष, पर सैटेलाइट को उड़ाने में प्रमुख चुनौती है वायुमंडलीय ड्रैग। इस ऊँचाई पर वायुमंडल की घनत्व बहुत कम होती है, लेकिन फिर भी यह सैटेलाइट के लिए लगातार एक प्रतिरोध पैदा करता है। इससे सैटेलाइट को अपनी कक्षा बनाए रखने के लिए लगातार थ्रस्ट की जरूरत होती है, जिससे फ्यूल का भारी उपभोग होता है।

एयर‑श्वास थ्रस्टर का नया दृष्टिकोण

इस नई तकनीक के तहत, थ्रस्टर वायुमंडल से ऑक्सीजन को इकट्ठा करके उसे दहन के लिए उपयोग करता है। इससे फ्यूल का उपयोग काफी कम हो जाता है, क्योंकि ऑक्सीजन का स्रोत वायुमंडल स्वयं ही प्रदान करता है। इस तरह सैटेलाइट का कुल वजन घटता है और उसकी कक्षा में बने रहने की क्षमता बढ़ती है।

सैटेलाइट के अंदर यह सिस्टम एक छोटे टर्बाइन के समान कार्य करता है, जो वायुमंडल से ऑक्सीजन को निकालता है और उसे दहन कक्ष में मिलाता है। दहन के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से थ्रस्ट पैदा होता है, जो सैटेलाइट को आगे बढ़ाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से स्वायत्त है और इसे चलाने के लिए किसी अतिरिक्त फ्यूल की आवश्यकता नहीं होती।

परीक्षण की तैयारी और समयरेखा

विज्ञानियों और इंजीनियरों ने इस थ्रस्टर का पहला इन‑स्पेस परीक्षण जल्द ही शुरू करने की योजना बनाई है। परीक्षण के दौरान, थ्रस्टर को एक छोटे प्रोटोटाइप सैटेलाइट पर माउंट किया जाएगा, जिसे वेरली लो अर्थ ऑर्बिट में भेजा जाएगा। वहाँ यह थ्रस्टर वायुमंडल के साथ अपनी इंटरैक्शन का वास्तविक अनुभव लेगा और उसकी कार्यक्षमता का आकलन किया जाएगा।

परीक्षण के दौरान, इंजीनियर थ्रस्टर के प्रदर्शन को मापेंगे, जैसे कि यह कितनी थ्रस्ट उत्पन्न कर रहा है, कितनी ऊर्जा बचत हो रही है, और वायुमंडलीय ड्रैग के मुकाबले इसकी दक्षता कैसी है। यह डेटा भविष्य के सैटेलाइट डिज़ाइनों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।

2‑इन‑1 प्रोपल्शन सिस्टम का समावेश

एक अन्य शोध में, एक 2‑इन‑1 प्रोपल्शन सिस्टम पर चर्चा की गई है, जो एयर‑श्वास थ्रस्टर के साथ पारंपरिक फ्यूल‑आधारित थ्रस्टर को जोड़ता है। इस संयोजन से सैटेलाइट को न केवल वायुमंडल के ऑक्सीजन का लाभ मिलता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर पारंपरिक फ्यूल का भी उपयोग किया जा सकता है। इससे मिशन की लचीलापन और विश्वसनीयता बढ़ती है।

इस 2‑इन‑1 सिस्टम का भी परीक्षण जल्द ही इन‑स्पेस में किया जाएगा। परीक्षण के दौरान, इंजीनियर यह देखेंगे कि दोनों सिस्टम कैसे समन्वय करते हैं, और क्या यह संयोजन वायुमंडलीय ड्रैग के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन देता है।

भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों पर प्रभाव

यदि यह एयर‑श्वास थ्रस्टर सफलतापूर्वक परीक्षण में उत्तीर्ण होता है, तो यह भविष्य के सैटेलाइट और उपग्रह मिशनों के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। कम फ्यूल की आवश्यकता का मतलब है कि सैटेलाइट का वजन कम होगा, जिससे लॉन्च लागत भी घटेगी।

इसके अलावा, यह तकनीक VLEO में दीर्घकालिक मिशनों को संभव बना सकती है, जहाँ वायुमंडल के ऑक्सीजन का लगातार उपयोग करके सैटेलाइट को अपनी कक्षा में बनाए रखा जा सकता है। इससे पृथ्वी के नज़दीकी वातावरण में अवलोकन, संचार, और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए नए अवसर खुलेंगे।

निष्कर्ष

एयर‑श्वास थ्रस्टर और 2‑इन‑1 प्रोपल्शन सिस्टम का परीक्षण अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नई दिशा दिखाता है। यह नवाचार वायुमंडल के ऑक्सीजन का उपयोग करके सैटेलाइट को आगे बढ़ाने की संभावना को साकार करता है, जिससे फ्यूल की खपत कम होगी और मिशन की दक्षता बढ़ेगी। आगामी परीक्षण के परिणामों का इंतज़ार करते हुए, यह स्पष्ट है कि यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।

यह भी पढ़ें

मूल स्रोत: Space