एप्पियर की नई रिसर्च NeurIPS में स्वीकृत, AI एजेंट्स अब खुद बना सकेंगे टूल्स

एप्पियर रिसर्च NeurIPS में स्वीकृत: AI एजेंट्स का नया कदम

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में एक बड़ा विकास सामने आया है, जहां ऐपपीयर (Appier) की नई रिसर्च को प्रतिष्ठित मंच NeurIPS में स्वीकार कर लिया गया है। इस रिसर्च पेपर का शीर्षक ‘Joint Optimization of Tool Creation and Use for Large Language Model Agents’ है। यह तकनीकी उपलब्धि दर्शाती है कि कैसे AI एजेंट्स अब न केवल पहले से उपलब्ध टूल्स का उपयोग कर सकते हैं, बल्कि अपनी जरूरतों के हिसाब से नए टूल्स का निर्माण भी कर सकते हैं। सिंगापुर में 30 सितंबर 2026 को की गई इस घोषणा ने टेक जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

इस शोध के केंद्र में SMITH (Schema-grounded Multi-task Iterative Tool Honing) नामक एक नया रीइंफोर्समेंट लर्निंग फ्रेमवर्क है। इस फ्रेमवर्क के जरिए AI मॉडल एक ही ट्रेनिंग लूप में टूल्स बनाना और उनका प्रभावी ढंग से उपयोग करना दोनों सीख लेते हैं। इसके अलावा, यह सिस्टम वास्तविक दुनिया की समस्या-समाधान के परिणामों के आधार पर टूल्स में लगातार सुधार करता रहता है।

WHAT CHANGED: SMITH फ्रेमवर्क और इसकी कार्यप्रणाली

पारंपरिक रूप से AI मॉडल को केवल मौजूदा टूल्स का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था, लेकिन नई पद्धति में चीजें बदल गई हैं। ऐपपीयर की इस रिसर्च के अनुसार, SMITH फ्रेमवर्क AI को टूल्स खुद डिजाइन करने की क्षमता देता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जब SMITH किसी मॉडल को टूल्स का उपयोग करना सिखाता है, तो वह मॉडल केवल टूल के विवरण और पैरामीटर स्पेसिफिकेशन को देखता है, न कि उसके अंतर्निहित कोड को।

यह प्रक्रिया आसान से कठिन की ओर बढ़ती है। ट्रेनिंग की शुरुआत 4 सरल उदाहरणों से होती है और फिर 16 कठिन तथा पहले न देखे गए समस्याओं पर परीक्षण किया जाता है। इससे मॉडल्स को वास्तविक परिस्थितियों में बेहतर परिणाम देने में मदद मिलती है।

KEY BENEFITS: छोटे मॉडल्स में बड़े परिणाम

इस तकनीक का एक सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह छोटे मॉडल्स को भी उच्च प्रदर्शन देने में सक्षम बनाती है। शोध के अनुसार, लगभग 4 बिलियन पैरामीटर वाले एक छोटे मॉडल ने SMITH की मदद से ऐसे टूल्स बनाए जो अध्ययन में शामिल अन्य तरीकों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। खास बात यह है कि इस छोटे मॉडल ने लगभग 30-बिलियन-पैरामीटर वाले बेसलाइन मॉडल को भी पीछे छोड़ दिया।

इन टूल्स का उपयोग लगभग 350 मिलियन पैरामीटर वाले एक हल्के मॉडल द्वारा भी किया गया, जिससे नए कार्यों को संभालने में आसानी हुई और बड़े मॉडल्स का प्रदर्शन भी बेहतर हुआ। इसके अलावा, प्रयोगों के दौरान यह देखा गया कि जहां पारंपरिक स्टेप-बाय-स्टेप रीज़निंग में औसतन 3,206 टोकन्स की आवश्यकता होती थी, वहीं रिपीटेड रीज़निंग को टूल में बदलने के बाद आउटपुट गिरकर केवल लगभग 100 टोकन्स पर आ गया।

BUSINESS IMPLICATIONS: टोकन लागत में कमी और स्केलेबिलिटी

बिजनेस और तकनीकी दृष्टिकोण से यह विकास काफी महत्वपूर्ण है। एआई ऑपरेशंस में टोकन की खपत और सर्वर कॉस्ट एक बड़ा विषय है। प्रूफ किए गए टूल्स को विभिन्न मॉडल्स और टास्क के बीच साझा करने से बार-बार होने वाली रीज़निंग का टोकन खर्च काफी हद तक कम हो जाता है।

एप्पियर (TSE: 4180), जो कि 2012 में स्थापित एक AI-नेटिव कंपनी है और APAC, US और EMEA में 17 कार्यालयों के साथ एजेंटिक AI एज ए सर्विस (AaaS) प्रदान करती है, इस तकनीक के जरिए एंटरप्राइज मार्केट्स में अपनी स्थिति को मजबूत कर रही है।

SECTOR IMPACT: स्केलेबल मल्टी-एजेंट सहयोग का मार्ग

यह तकनीक भविष्य में मल्टी-एजेंट सहयोग के लिए नए रास्ते खोलती है। जिस प्रकार इंसान अपने समस्या-समाधान के अनुभवों को टूल्स में बदल लेते हैं ताकि उन्हें हर बार शून्य से शुरुआत न करनी पड़े, उसी तरह अब AI एजेंट्स भी विकसित हो रहे हैं। यह क्लोज्ड लूप—बनाना, उपयोग करना, सत्यापित करना और परिष्कृत करना—टूल की गुणवत्ता को लगातार बेहतर बनाता रहता है।

RISKS OR LIMITATIONS: भविष्य की चुनौतियाँ और अनिश्चितताएँ

हालांकि यह रिसर्च मील का पत्थर साबित हो रही है, फिर भी इसमें कुछ सीमाएं और भविष्य के लक्ष्य शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में ऐसे मॉडल्स तैयार करने की चुनौती है जो लगातार अपने पर्यावरण के साथ इंटरैक्ट कर सकें और अधिक व्यापक श्रेणी के कार्यों को संभाल सकें। वर्तमान में यह तकनीक नियंत्रित वातावरण में परोसी गई है, और वास्तविक दुनिया के अत्यधिक जटिल परिदृश्यों में इसका बड़े पैमाने पर परीक्षण होना अभी बाकी है।

WHO MAY BE AFFECTED: किसे होगा असर?

इस तकनीक से सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, एंटरप्राइज ऑटोमेशन, और लार्ज लैंग्वेज मॉडल आधारित ऐप्स विकसित करने वाली कंपनियों को सीधा लाभ मिल सकता है। जो कंपनियां अधिक कंप्यूटेशनल पावर और बड़े मॉडल्स के भारी खर्च से जूझ रही हैं, वे कम पैरामीटर वाले छोटे मॉडल्स के जरिए लागत को अनुकूलित कर सकेंगी।

WHAT TO WATCH NEXT: आगे क्या देखना बाकी है?

एप्पियर की इस सफलता के बाद, यह देखना दिलचस्प होगा कि उद्योग जगत इस SMITH फ्रेमवर्क को अपने कमर्शियल प्रोडक्ट्स में कैसे एकीकृत करता है। शोधकर्ताओं की अगली योजना ऐसे मॉडल्स बनाने की है जो निरंतर अपने परिवेश से सीखकर और भी अधिक जटिल कार्यभार संभाल सकें। आगामी महीनों में NeurIPS सम्मेलन और इस तकनीक के व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।