परिचय: स्मार्ट ग्लासेस क्यों फेल हो रहे हैं
कंज्यूमर टेक्नोलॉजी के इतिहास में कई ऐसे गैजेट आए जिन्होंने दुनिया बदलने का दावा किया, लेकिन आखिरकार वे बाजार में टिक नहीं पाए। स्मार्ट ग्लासेस (Smart Glasses) इस समय इसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। मैट रोजर्स (Matt Rogers), जो कि वेस्टेड फूड प्रिवेंशन कंपनी मिल (Mill) के को-फाउंडर और सीईओ हैं, ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि स्मार्ट ग्लासेस क्यों फेल हो रहे हैं। सैन ब्रूनो, कैलिफोर्निया स्थित कंपनी के प्रमुख रोजर्स का मानना है कि सबसे अच्छी टेक्नोलॉजी वह होती है जो हमारे जीवन में पूरी तरह घुल-मिल जाती है, और यहीं स्मार्ट ग्लासेस असफल हो जाते हैं।
मैट रोजर्स वे शख्स हैं जिन्होंने नेस्ट (Nest) की स्थापना की थी और स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) के साथ मिलकर पहले आईफोन और डिवाइस हार्डवेयर के निर्माण में काम किया था। उनका अनुभव इस बात को गहराई से समझता है कि कौन सा गैजेट कंज्यूमर के हाथों में टिकेगा और कौन सा धूल फांकेगा।
स्मार्ट ग्लासेस और वियरएबल्स की मूल समस्या
तकनीकी उद्योग अक्सर इस सवाल से जूझता है कि किसी नए गैजेट को कैसे डिजाइन किया जाए। लेकिन असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या लोग वास्तव में उस तकनीक के साथ जीना चाहेंगे? स्मार्ट ग्लासेस की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वे यूजर के चेहरे पर ठीक बीच में बैठते हैं। इन्हें पहनकर कोई भी व्यक्ति खुद या दूसरों की नजरों से बच नहीं सकता। यह बनावट ही इन गैजेट्स को असहज बनाती है।
इसके विपरीत, वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट्स के साथ एक अलग तरह की समस्या है। ये डिवाइस उन लोगों को बाहर कर देते हैं और असुविधा में डालते हैं जो उस वर्चुअल अनुभव का हिस्सा नहीं बन पा रहे हैं। इस तरह की तकनीकें सामाजिक मेलजोल में बाधा बनती हैं, जिससे वे लंबे समय तक टिकाऊ साबित नहीं होतीं।
क्या बदला है: सफल टेक्नोलॉजी के लक्षण
यदि हम स्मार्टफोन की सफलता पर नजर डालें, तो पता चलता है कि उन्होंने एक मजबूत इकोसिस्टम के लिए आधार प्रदान किया। स्मार्टफोन आसानी से जेब या पर्स में फिट हो जाते हैं और हाथों का विस्तार बन जाते हैं। मैट रोजर्स के अनुसार, कंज्यूमर टेक्नोलॉजी ऐसी होनी चाहिए जो बिना किसी यूजर मैन्युअल के पहले दिन बॉक्स से बाहर निकालते ही काम करने लगे और जिसका सेटअप पूरा होने में केवल कुछ सेकंड लगें।
दूसरी ओर, कई बार टेक कंपनियां यह सोचकर आगे बढ़ती हैं कि “क्या हम इसे बना सकते हैं?” लेकिन वे यह सोचना भूल जाती हैं कि “क्या लोगों को वास्तव में इसके साथ रहना चाहिए?” यह वही स्थिति है जैसी डॉ. इयान मैल्कम ने फिल्मों में कही थी—वे इस बात से इतने व्यस्त थे कि क्या वे ऐसा कर सकते हैं, कि उन्होंने यह नहीं सोचा कि क्या उन्हें ऐसा करना चाहिए।
व्यापारिक निहितार्थ और सेक्टर इंपैक्ट
टेक्नोलॉजी सेक्टर में इनोवेशन और व्यावहारिकता के बीच का संतुलन बहुत नाजुक होता है। नेस्ट (जिसे 2014 में Google द्वारा अधिग्रहित किया गया था) और आईपोड जैसे उत्पादों ने यह साबित किया कि जब तकनीक जीवन में सहज रूप से घुल जाती है, तो वह बाजार में छा जाती है। आईपॉड के 25 वर्ष पूरे होने और नेस्ट थर्मोस्टेट के 15 वर्ष पूरे होने के इस दौर में, हार्डवेयर डेवलपर्स के लिए यह एक बड़ा सबक है।
फाइनेंस और इन्वेस्टमेंट के नजरिए से, ऐसी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है जो केवल ट्रेंड के पीछे भागती हैं और यूजर की रोजमर्रा की जरूरतों की अनदेखी करती हैं। इनकैट डॉट ओआरजी (Incite.org) के संस्थापक और उद्योग के दिग्गज यह मानते हैं कि भविष्य में वही उत्पाद टिकेंगे जो लोगों पर थोपे जाने के बजाय उनकी जीवनशैली का स्वाभाविक हिस्सा बन जाएं।
जोखिम, सीमाएं और आगे क्या देखना है
भविष्य की उन्नत एआई (AI) वियरएबल डिवाइस के बारे में अभी यह अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या वे कभी सामान्य जीवन में इस तरह से घुल-मिल पाएंगी कि यूजर उनके बिना रहने की कल्पना न कर सकें। वर्तमान में स्मार्ट ग्लासेस और हेडसेट्स की डिजाइन और उपयोगिता दोनों मोर्चों पर भारी सीमाएं हैं।
आने वाले समय में बाजार यह देखेगा कि क्या कंपनियां केवल स्पेसिफिकेशन और स्पेसेज़ बढ़ाने के बजाय यूजर एक्सपीरियंस और सहजता पर ध्यान केंद्रित करती हैं या नहीं। जब तक गैजेट्स इंसान के बीच की दीवार बनते रहेंगे, तब तक उनकी सफलता संदेह के घेरे में रहेगी।
